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| खुशियां मर्ज़ी हैं अपने जीने की |
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मुकद्दर में था कुछ छूट गया !
सपना ही तो था जो टूट गया !!
इरादे जो पूरी रात जगाये रखे !
रोशनी का क्या कब बुझ गया !!
कोशिशों को दुआओं से क्या !
हारा बुज़दिल वो जो रुक गया !!
खुशियां मर्ज़ी हैं अपने जीने की !
फिर क्यों मनाना जो रुठ गया !!
खुदी के जोर पर जूनून हो गर !
एहसान की नजर वो छुप गया !!
तजुर्बे का हैं दुनियां मोहताज !
गुरुर बेआबरू जो झुक गया !!
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