*जय श्री कृष्णा सबको *
मुरली मधुर बजा जा कृष्णा प्रीत की लय और तान में !
संतोष परम सुःख देजा गिरधर कलयुग के इंसान में !!
मद मदिरा की शान बहुत है माखन का गुड़गान नहीं !
Pubs disco की चका चौध में तेरी लीला का सम्मान नहीं !!
ग्वाला तेरे गइयो का अपमान यहाँ काटते बेचते खाल को !
चक्र सुदर्शन से काट दो भगवन राजनीत के जाल को !!
विचार विकार मन की दुर्गुणता में मिलजुल सब एक समान है !
हवस काम से भरी नज़रो में नहीं रिश्तो की पहचान है !!
ऐसी होड़ मची है आपस में की सगे नहीं कोई अपने कौम के !
कृपा करो प्रभु सुबह को निकले शाम आ जाये घर लौट के !!
धर्म जाती की मार बड़ी परहित धर्म कर्म का मान नहीं !
अपसब्दो का संगीत स्वरों में तेरे भगवतगीता का ज्ञान नहीं !!
कुछ ऐसा कर दो कान्हा लोगो में जो जिए और जीने दे प्यार में !
जैसा तूने रचा है प्रकृति को खुसबू रच जाये संसार में !!
जिसकी जैसी करनी हो कृष्ण कन्हैया उसको दो वैसा अंजाम !
आके फिर से बसा जाओ गोपाल शांत सुखद नगरी गोकुलधाम !!
संतोष परम सुःख देजा गिरधर कलयुग के इंसान में !!
मद मदिरा की शान बहुत है माखन का गुड़गान नहीं !
Pubs disco की चका चौध में तेरी लीला का सम्मान नहीं !!
ग्वाला तेरे गइयो का अपमान यहाँ काटते बेचते खाल को !
चक्र सुदर्शन से काट दो भगवन राजनीत के जाल को !!
विचार विकार मन की दुर्गुणता में मिलजुल सब एक समान है !
हवस काम से भरी नज़रो में नहीं रिश्तो की पहचान है !!
ऐसी होड़ मची है आपस में की सगे नहीं कोई अपने कौम के !
कृपा करो प्रभु सुबह को निकले शाम आ जाये घर लौट के !!
धर्म जाती की मार बड़ी परहित धर्म कर्म का मान नहीं !
अपसब्दो का संगीत स्वरों में तेरे भगवतगीता का ज्ञान नहीं !!
कुछ ऐसा कर दो कान्हा लोगो में जो जिए और जीने दे प्यार में !
जैसा तूने रचा है प्रकृति को खुसबू रच जाये संसार में !!
जिसकी जैसी करनी हो कृष्ण कन्हैया उसको दो वैसा अंजाम !
आके फिर से बसा जाओ गोपाल शांत सुखद नगरी गोकुलधाम !!
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