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दुआ सी कबूल हो जाती ईबादत-ऐ-मन्नतें ,
किसीको जीने के लिए ख्वाहिशे संवारा होता !
मुकम्मल हजारों होते हैं जिंदगी के काश में,
किसीकी आरजू मे खुद को गर हारा होता !!
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ईर्ष्या,स्वार्थ,भय,पीड़ा जी रहे मनो द्धेष में ,
रावण ने हरा था सीता को साधु के भेष में !
छल,कपट,झूट,बे-अदब से सबके कारवां ,
जाने क्या-क्या हो रहा इस राम के देश में !!
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डमरू की ध्वनि से अह्नाद स्वर दिया ,
भय काम मोक्ष तन मन उद्धार किया !
भूतो भस्म से सजे त्रिशूल गंगा विराजे
लोक सृष्टि शक्ति से ॐ -श्रृंगार किया !!
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