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| MRImage#01 |
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बरसो पुरानी रही सही
क्रोध जलाए हुए ,
बात बात पर अकड़...
रिश्तों पर झुझलाता क्यो हैं !
आंख भरा रहता हैं
दु:ख पीड़ा सहता,
चुप छुपा के मान कोई....
दुनिया से झुठलाता क्यो हैं !!
न जाने कितनो ने नफरतों का
जहर घोला होगा ,
और लोग पुछते हैं ....
ऐ समन्दर अखरता क्यों हैं !
मन का पाप हैं छुपाया हुआ
गंगा मैली हो गयी ,
शीतल पावन जल मे....
तन अब जलता क्यो हैं !!
बस्तियां जले औरो के
रौशन घर मेरे हो,
झूठ कपट जरुरी सा
स्वार्थ सबको छलता क्यों हैं !
जिंदगी मिली अफरा तफरी
जुग जुग जीते कुछ ,
तड़पकर बहुत से ....
गरीबी में मरता क्यो हैं !!
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#Indian #Politics #Strikes #Humanity #Poverty








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