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Monday, 9 April 2018

कदर क्या मानवता की....

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कटती नहीं जिंदगी अब लाख जतन जताने में ! 
नफा कुछ न बही खाता बचा क्या आजमाने में !! 

भ्रष्टाचार ,सिफारिश मे डिग्रियां किस काम की !
आरक्षण में मजबूर कितने दर बदर भटक जाने में !!

घर परिवार बच्चे जिम्मेदारीयां निबाहना जैसे तैसे! 
शर्म कैसी पढ़ लिख कर भी मजदूर बन जाने मे !! 

आस कुछ रोजी नहीं मंहगाई भी तो गजब की हैं ! 
दिन गुजर जाता किसी तरह दो रोटियां कमाने में !! 

शहीद हुए कितने मगर कदर क्या मानवता की हुई ! 
किसानों को देख डर लगता युवा को हल उठाने में !! 

गरीब मां-बाप क्या उम्मीद भी रह सह जाते हैं ! 
सबको पता हैं छल रहा कोई आज के जमाने में !! 

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