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| गरीबी तो सबको इंसान समझती है |
पिंटू मेरा डैडी पिंटू मेरा डैडी चीखने की आवाज मेरे कानो आ चुभी ,अभी अभी नए साल की सबको शुभकामनाएं भेज कर सोया ही था की पड़ोस की दीदी जोर जोर से रोती चीखती पूरी कालोनी का चक्कर लगा,आखिरी दरवाजा कालोनी के दरबान का खटखटा रही थी, मदद की गुहार लगा रही थी ! रात के ३ बज चुके थे, दरवाजा खोल के मै भी गया उनकी हालत देख बिना कुछ पूछे जाने उनके घर जा पंहुचा ,पता चला रात १२ बजे ही अंकल ( दीदी के डैडी ) को हार्ट अटैक आया था ! नजदीक के जिस अस्पताल से उन्होंने सहायता के लिए फोन किया वहा कोई था ही नहीं इमरजेंसी स्टाफ में ,बहुत कोशिश के बाद एक दूसरे अस्पताल से एक स्टाफ आया भी तो आपको बता दू उसको ऑक्सीजन तक लगाना नहीं आ रहा था ! तक़रीबन डेढ़ घंटे वो ऑक्सीजन सिलिंडर के सेटअप में उलझा रहा , "नामी बड़े अस्पताल का फ़र्ज़ी स्टाफ" ! अब उस कमरे में दीदी उनके पति,दरबान,एक रिक्से वाला और मै था ! दीदी उस स्टाफ पर भड़क उठी कैसे इमरजेंसी स्टाफ हो तुम्हे ऑक्सीजन तक लगाना नहीं आ रहा और उसका हाथ झटक के खुद घबरा घबरा के कोशिश करने लगी ! किसी तरह मैने दीदी के साथ दरबान और रिक्से वाले को साथ लेकर कोशिश की फिर कही जाके ऑक्सीजन तो लगा दीये और अपने जान हर संभव प्रयास किये पर देर बहुत हो चुकी थी और अंकल का शरीर पूरा ठंडा हो चुका था! अब तक जो हमने एम्बुलेंस किसी दोस्त से सम्पर्क करके अरेंज किया था वो भी आ चुका था ! हमलोग मिलकर अस्पताल लेकर गए फिर वहां पर डाक्टर ने चेक किया नब्ज वगैरह देखीं और काफी अफ़सोस भरे शब्दो में मृत घोषित कर दिया ! फिलहाल अपने जस तो हमने कोशिश भरपूर किया पर होनी को नहीं टाल पाए! अक्सर अंकल शाम को हमसे मिला करते थे स्वाभाव से बेहद मददगार और प्रोत्साहन देने वाले हाल चाल पूछते रहते थे ! रियलिटी शोज और गानों के बेहद शौक़ीन थे कोई एपिसोड उनसे बचता नहीं था!उनके स्मार्ट फोन का भरोशेमंद इंजीनियर मै ही था,कोई त्यौहार ऐसा नहीं होता था जिसमे उनका सुबह सुबह शुभकानाए फोन करके ना आये!
ऐसे हालात है आज के दौर में ये कमाई के लिए खुले ढकोसले वाले बड़े बड़े दिखावटी अस्पताल और फ़र्ज़ी के डाक्टर किस काम के जब इनके पास समय पर कुछ उपलब्ध ही नहीं...न ऑक्सीजन न स्टाफ न दवाइयां और एमर्जेन्सी में एम्बुलेंस है तो ड्राइवर नहीं ,स्टाफ है तो उसको कुछ आता नहीं ऊपर से बेशर्मी से बोलते है हम क्या कर सकते है ,सब भगवान् भरोसे है !
और क्या कहूं पहली दफा शहर का ऐसा रवईया देखा !कितनी अच्छी नींद आती है अगर किसी से कोई मतलब न हो किसी का,थोड़ा बहुत सक्षम हो जाने से और अगर रखना भी हो तो अपने स्वार्थ बस !सैकड़ो लोगो में से कोई साथ था उस वक़्त तो हमारा दरबान और वो रिक्से वाला जिसको हमलोग लेकर दौड़ रहे थे!
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१०० दिन का हिसाब रखते देखा रईशो को ,वो एक दिन का एहसान मानते भी नहीं !
गरीबी तो सबको इंसान समझती है,ये अमीरी वक़्त पर किसी को पहचानते भी नहीं !!
फटेहाल तन तवज्जो में सर झुकाते,दो मीठे बोल पर खुद को न्योछावर कर देने वाले !
ये बादशाह है दिलो के बावजूद कमी के,बेईमानी स्वार्थ क्या होता है..जानते भी नहीं !!
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