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Wednesday, 27 December 2017

मंदिर और मस्जिद के सिवा कुछ और भी.....



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जहा देखो जब देखो जिधर देखो बस एक ही नारा ये हमारा वो हमारा ये हुआ वो हुआ हम ऐसे तुम वैसे ! कुछ उत्तेजना और भड़की बातो का बवंडर लिए राजनीती और अपने अपने समाज का चर्चा लिए इधर उधर कोई न कोई मिलता रहता है आम बात हो गयी है हो हल्ला मचाये चीखते चिल्लाते गुटबाजी करते हुए! तरह तरह के राजनितिक चर्चाओं में एक ये भी,बहुत ही अहम् मुद्दा राजनीती का ही नहीं आज पूरे भारत में हर हिन्दू की मांग है राम मंदिर अयोध्या में बनना चाहिए ,मुस्लिम कहते है मस्जिद होना चाहिए! पर कोई ये बात भी करे और लोगो को इन समस्याओ से अवगत कराये और आश्वासन भी दे की राम मंदिर या मस्जिद भारत में शिक्षा,भूख,गरीबी,बेरोजगारी,लूट,भ्रस्टाचार,बलात्कार,क़त्ल,मदभेद,जातिवाद,आतंकवाद जैसे तमाम मुद्दों से ज्यादा जरुरी है और इनके निपटारे से ये सारी समस्याएं दुरुस्त किया जा सकता है ,और हिन्दू-मुस्लिम के बीच चली आ रही बरसो पुरानी दुर्भावना,आपसी ईर्ष्या क्या मंदिर-मस्जिद से सुलझाया जा सकता है ,गंगा जमुनी तहजीब मंदिर -मस्जिद बन जाने से खत्म हो जाएगा क्या!
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 लाखो करोडो का खर्च मंदिर-मस्जिद बनाने में जो पहले से संख्या में कही ज्यादा है शिक्षा के लिए सरकारी,प्राइवेट बने स्कूलों से ,फिर भी अभी कितनो के नसीब में शिक्षा नहीं है,रोजी-रोटी दो वक़्त का नहीं है ,रहने को छाया नहीं है ,पहनने को कपडे नहीं है ,पीने को पानी नहीं है!क्या हमारी आस्था हजारो मंदिर-मस्जिद की मोहताज है या हमने अपनी आस्था को अपने धार्मिक गुरुर में परिवर्तित कर लिया है और एक दूसरे से हार नहीं मानना चाह रहे! कोई ये समझाए अभी हमारे देश में हजारो राम मंदिर है,हजारो मस्जिद है पर कितने राम के चरित्र को अपनाये और कितनो ने मुहम्मद पैगम्बर साहब को !जितने लोग इन मुद्दों पर बहस कर रहे है भड़कते रहते है ,अनाप सनाप बात बढ़ाते है उनमे से कोई एक तो सामने आके कहे हां मैं राम का अनुसरण करता हूँ, हां मैं मुहम्मद साहब का पैगम्बर हूँ! जब इतना सब कुछ पहले से होते हुए भी ये दुर्दसा है तो अब कितने मंदिर-मस्जिद और बना दिए जाए की इन तरह-तरह के देश के आंतरिक समस्याओ का अंत हो जाए! आस्था में हमें आँख बंद करना चाहिए पर हम तो दिमाग अंधा कर बैठे है! नास्तिकता में इतना भी हठ नहीं कर जाए की जबरदस्ती इंसानियत भूल जाए !
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   हमारी आस्था इतनी तक सीमित हो गयी की मंदिर-मस्जिद देखे बिना तो सर नहीं झुकता ,बंद आँखों में जो खुदा दिखना चाहिए उसे दुःचरित्र से ढूढ़ रहे है!क्या यही है हमारे नायक का चरित्र! हम यही अनुसरण में जानते है! सोशल साइट्स पर तमाम मदभेद वाले वीडियो बनाकर एक दूसरे के प्रति भड़काने से अच्छा हो आमने-सामने मिलकर आपसी भूल चूक ख़त्म कर लो और बेझिझक निश्चितरूप से हो भी जाएगा ! कोई भी हो किसी भी मजहब का हो राष्ट्र और राष्ट्र के प्रति आदर-भाव ही प्रथम धरम है! देश का विकास जाती और धर्मो से कदापि नहीं हो सकता है ,इसके लिए सबको देश का प्रतिबद्ध नागरिक बनके अपना सही जिम्मेदारी निभा के ही किया जा सकता है! देश के युवा चाहे धर्म कोई भी हो इंसानियत पहले सीख लेना आज के समय में सबसे पहला कर्त्तव्य है ! मैं किसी धर्म जाती विशेष का विरोधी या विपक्षी नहीं हूँ पर मेरा मानना है हमें सबके प्रति सम्मान और विश्वाश का भाव रखकर इन सब मुद्दों से हटकर एक-दूसरे के हित में सोचना चाहिए ! मैं अपनी व्यथा और क्या कहु मेरे युवा भाइयो.......



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आवाज बुलंद हो तो ये शोर भी सुनाओ ,
कुछ बाते उठानी है तो इनके लिए भी कहो!
लड़ाई लड़नी ही है तो इनके लिए लड़ो ,
ताकत है तो इनके मदद के लिए बढ़ो !!
हिम्मत है तो इनके साथ दो कदम चलो,
धर्म अपनाना है तो इनसे रिश्ता बना लो !
कुछ निभाना है तो इनसे गले मिल जाओ ,
कुछ चाहत है तो इन्हे खुशी का बहाना दो !!
अगर गम है तो इनके आंसू पोंछ दो ,
कुछ पाना है तो इनसे कुछ दुआएँ ले लो !
सम्मान चाहिए तो इनका प्यार पा लो ,
शोहरत हो तो इनका आसिया बसा दो !!  

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क्या कहे इनको हम और क्या सुनाये ये हमें अपनी बीती! इतना सबकुछ दयनीय परीस्थिति रुखसुखा भुखमरी न छत न जमीं को झेल रहे होने के बावजूद शायद इन तस्वीरों को देख कर हम इनके तकलीफो को समझ सके ,जितनी सहजता से ये कैमरे के सामने फोटो के लिए मुस्कुरा दिए है उतनी सहजता हममे नहीं है की हम इन तस्वीरों को बखूबी बिना आँखे नम हुयी इनको इत्मीनान से निहार भी सके! मैं ना कोई प्रवक्ता हूँ ना विशेषज्ञ एक साधारण इंसान होने के नाते जो अनुभव है वही कहता हूँ करता हूँ ! धर्म की मैं क्या व्याख्या करू जो जनता हूँ समझता हूँ वही यहाँ वर्णन कर रहा हूँ.......



                                      ......धर्म......
धर्म धारण करने की परम्परा है न की दिखावा और दुसरो को नीचा दिखाने के लिए !
धर्म दुसरो की सेवा करना सिखाता है न की किसी कमजोर को कष्ट पहुंचाया जाए !!
धर्म दिन-दयालुता का परिचायक है न की आपसी ईर्ष्या द्वेष का अहम् होने के लिए !
धर्म मर्यादा ,मान सम्मान के प्रति समर्पण है न की औरो का अवहेलना किया जाए !!
धर्म आचरण है संस्कार है समाज है न की रंजिसो में मिटता लहुलहान एकता के लिए !
धर्म चरित्र है मानव शरीर का न की मंदिर में मूर्ति से अनादर कर विध्वंश किया जाए !!
धर्म सच्चाई है ईमान है मन का न की गरीब-बेसहारा का हक़ छीनने ठगने के लिए !
धर्म इंसानियत है बेजुबानो तक भी न की स्वार्थ के खातिर कोई प्रताड़ित किया जाए !!
धर्म भाईचारा है रिश्ता है मानवता का न की शिकवा-शिकायत तोह लगाने के लिए !
धर्म है जिगर से जिगर लगा गले मिलना न की धोका बस पीठ पीछे वार किया जाए !!
धर्म सात्विकता साधना राष्ट्र के प्रति नेकभाव है न की अपने हित में राष्ट्रद्रोह के लिए !
धर्म देश के प्रति खुद की कुर्बानी है न की औरो पर इसे थोपकर बलिदान किया जाए !!
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साधू महात्मा मौलवी ये सब सही तो सही राजनितिक पार्टिया जो मंदिर-मस्जिद के लिए इतने विचारधीन है ,मेरे मुताबिक़ अगर ए लोग अब तक मंदिर-मस्जिद से हटकर थोड़ा प्रयास आज के युवाओं मे राम -रहीम के आचरण और चरित्र  को परिभाषित ,अनुसरण ,उत्तम उपयोग व संसकारों से परिचित कराने मे उपस्थित हुए होते तो आज तक मंदिर-मस्जिद तो नहीं बन पाया पर शायद पूरे भारत मे राम-रहीम से युवा और समस्त भारत एक समृद्ध राष्ट्र 'राम राज्य' जरूर हो जाता !

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"भगवान चित्र में नहीं चरित्र मे बसता हैं "
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