आस्था हमारा आत्मविश्वास है ,न की मन में किसी अंधविश्वास ,पाखण्ड और रिवाजो का डर बनाकर रखना ! भलीभांति हम सब इस बात से परिचित है जो जन्म लिया है उसका मृत्यु भी निश्चित है "ब्रह्म सत्यम जगत मिथ्या "! जन्म और मृत्यु के अंतराल हम एक साधारण मानवजाति है,और हमें वैसा ही जीवन जीने का कर्त्तव्य निभाना पड़ता है ! इसके अलावा न हमारा कोई धेय है ,ना ही कोई दुसरा विकल्प और ना ही कोई औपचारिकता जिसका हम अनुसरण करने के लिए प्रतिबद्ध हो ! आज कुछ इन्ही विषयों से ले देकर रूढ़िवादी अनभल अराजक तर्कों का खंडन करना चाहा हूँ !
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भारतीय परम्परा ,संस्कृति और सभ्यता के अनुसार हमारे यहाँ जब किसी का देहांत हो जाता है तो हम उसके श्राद्ध संस्कार को पूरी निष्ठा से बिना कोई गलती के निबाह करते है ,और इस बात का ध्यान भी रखते है कही हमसे कुछ भूल चूक न रह जाए की हमारे पूर्वज नाराज हो जाए और सम्पूर्ण परिवार पर समस्या हो जाए ! यही नहीं सबकुछ हो जाने के बाद भी उनके लिए किसी उचित स्थान पर मंदिर या चबूतरा ( बरम बाबा जिसे कहते है ) बनाकर मान सम्मान से स्थापित करते है और हमेशा ख़याल भी रखते है ,परिवार के लिए किये कर्तव्यों का उनका आभार प्रकट करते रहते है नित,प्रतिदिन ! इसी से हम भारतीयों के भोलेपन का ,आचार-विचार और व्य्वहार का पता लगाया जा सकता है !
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तमाम इतिहास और समय को लेकर बात करे तो कई राजा ,मुगलो का शाशन और अंग्रेजो का राज बीत गया ! उनके अस्तित्व और प्रतिष्ठा को बरकरार रखने के लिए उनकी मुर्तिया जहा तहा चौराहे ,रास्ते पर टांग दिया गया ! और यही देखीदेखा को बढ़ाते हुए आजाद भारत में हम अपने स्वतन्त्र सेनानियों ,पूर्वजो का भी मूर्तियों का विस्थापन तो कर दिए पर शायद कभी उन मूर्तियों को फिर कभी झुककर सम्मान दिया हो ,उनके अस्तित्व का अभिवादन करते हो ,किसी दिन तो वहा जाकर उनकी गौरव गाथा याद किये हो ! शायद नहीं हर कोई अपने निजी जीवन के उलझनों से ही फुरसत नहीं है ,इन बातो की तो बहुत दूरी है !
ये कोई भारतीय परम्परा या संस्कृत की देन नहीं है ,और ना ही हम ऐसा कुछ अपने पूर्वजो के सम्मान के लिए बेढंग सा अनुचित प्रतिक्रया करते है ,और ना ही हमें ऐसे ढकोशलो में शामिल होना चाहिए ! असल में इस तरह का कार्य कई राजाओ,मुगलो और अंग्रेजो के कार्यकाल में जनता में जबरदस्ती उनका हरसमय आभार जताने ,भय बनाये रखने या कह सकते है सम्मान जताने के लिए किया गया था ! ताकि जनता उनके बनाये नियमो का बिना आवाज उठाये मान ले और चुप-चाप रहे ,कभी कोई विरोध ना हो ! और ये जो भी मुर्तिया बनी पहले उनकी बनी जिन्होंने जनता का शोषण किया ,बाद में जनता ने अपने नायक का वैसा ही मूर्ति लगा दिया उनका अभिवादन और आभार प्रकट करने के लिए!
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आज भी यह सब इसलिए किया जा रहा है ताकि हरकिसी का अपना एक अलग छवि बना रहे ! राजनीति को लेकर तो यह बहुत ज्यादा हुआ है ,और आजाद भारत में सबसे ज्यादा राजनितिक पार्टियों का अपना -अपना वोटबैंक बनाने को लेकर ! इन लोगो ने अपने चक्कर में जगह जगह मूर्तियो का अनावरण तो कर दिया पर कभी उनका ख़याल रखते हो शायद ! बीच चौराहा या रास्ता क्या उचित स्थान है हमारे पूर्वजो के मान-सम्मान बढ़ाने के लिए ,उनके गौरव को कहने के लिए ! मै तो नहीं मानता ऐसे ये तरीका अच्छा है ! स्कूल या बाग़ बग़ीचा या म्यूजियम हां सही हो सकता है !
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वर्तमान समय को देखते हुए ऐसे प्रथाओं ,क्रियाकलापों पर भारत सरकार और सुप्रीम कोर्ट को प्रतिबद्ध होककर रोक लगाना चाहिए ! ऐसे गतिविधियों पर कड़े क़ानून होने चाहिए और करने वालो के खिलाफ कड़ी करवाई भी हो ! रास्ते चौराहो पर जो भी मंदिर,मस्जिद,गुरुद्वारा और चर्च हो या बीच चौराहा जनता के स्थान ,भीड़भाड़ ,यातायात के स्थान पर बने हुये इन मूर्तियो को वहां से हटवा देना चाहिए ! जो जरुरी हो उन्ही को ,जनता की भवनाओ को और स्वंत्रता सेनानियों,भारतीय पूर्वजो के गौरव का ध्यान रखते हुये कही उचित स्थान पर रखवा देना चाहिए !
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मेरा मानना है इनकी वजह से कई तरह के यातायात में समस्याएं उत्पन्न होते है और दुर्घटनाये भी बढ़ते है ! यातायात के हजारो नियम और सुरक्षा बनाने,जनता पर तरह-तरह की प्रतिबद्धता लागू करना, हेन-तेन बेवजह के तर्क से अच्छा है इन जगहों को खाली करके वहा आज के वर्तमान इंजीनियरिंग से बने नेहतरीन से बेहतरीन सुरक्षा से समन्धित उपायों को उपलब्ध कराया जाना चाहिए ! इससे ट्रैफिक पुलिस की सहायता भी होगा और होने वाले दुर्घटनाओं में कमी भी होगी ! यह एक अच्छा समझौता हो सकता है सभी भारतीयों के लिए और जनहित में उठाया एक बेहतरीन कदम ! अगर नोटबंदी बाहरी सुरक्षा की दृश्टिकोण से सही था तो यह भी जनहित और आतंरिक यातायात सुरक्षा के लिए बहुत उपयोगी सिद्ध होगा ! यही नहीं जनसाधारण में कुछ बदलाव भी होगा वर्तमान लाग-लगाव आपसी मदभेद कम होंगे जो इन सब की वजह से होते रहते है !
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इस तरह के ढकोशलेबाजी में आके हम किसी को सम्मान नहीं दे सकते और ना ही यह कोई उचित औपचारिकता ही है ! आस्था,इतिहास और तमाम मजहब ,संस्कृति ,सभ्यता ना ऐसा है ना ही होना चाहिए ! हमें कभी ऐसे तथ्यों को स्वीकार नहीं करना चाहिए जो हमारे आदर्शो को ठेस पहुचाये ! बीच चौराहा ,रास्ता बिल्कुल अनुचित है और देखावटी राजनीती अंध छवि ढकोशला है ! हम सबको मिलकर ऐसे अनायास बेफिजूल दिखावटीपन वाले राजनीती और अराजकता मदभेद आदि से दूरी बनाये रखना चाहिए ,और पूर्णतः असहमत प्रतिक्रिया देना चाहिए ! भारत आजाद तो हो गया है पर हम अभी भी कई विचारधारा ,अंध अनुसरण और विकल्पों के अधीन गुलाम होकर कैद है ,हमें उनसे भी आजाद होना है !
जय हिन्द -जय भारत
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