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Wednesday, 24 January 2018

गम-ए-दहलीज पर.....

गम-ए-दहलीज पर
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दफन ए जज्बात गवाएं पुकारता अपनो की दुअा !
बेहिसाब सिसकियों के ढेर पर बिखरा उजड़ा शहर !
कराहती पीड़ा मन का भार बड़ा बेबस सा हुअा !!
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थकी सिकन इस तरह खौफ बदहाल मंजर ढहा !
टूटा छूटा अपना सपना हर बौखलाहट समा रोया !
जिगर जान ए अास लिपट जाउ हो कोइ जो अपना !!
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दरारे दर्द की जहन्नुम ए हमें घुटकर छुपकर तड़पाए !
थामे गुजरे बसरे बस्तियों रिश्तो को उजड़ता देख !
भरी अाखे तरसती जी रही कुछ मजबुरिया कर जमा !!
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हो ना हो कोइ अावाज गर तुझ तक पहुचे खुदा !
उल्फत ए अन्जाम दर-बदर गम-ए-दहलीज पर !
किस हद तक निबाहेगे हम ए इसांन होने की सजा !!
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