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Wednesday, 24 January 2018

हमारे समाज मे ...........

हमारे समाज मे भी जीती जिदंगी मे पर्दे लगे हुए है, शायद इसीलिए कइ लोग दोहरी छवी वाली सामाजिकता पनपाए रखते है। कुछ परिभाषित परिचित निसंदेह एसी परम्पराअो को हम जीवन सार समझ रखते हैं, जबकी नियति से भिन्न है एैसे समाज के संवेदनशील,शर्मसार उल्लंघन,धर्मार्थ छलावे करते परम्परा। दुर्व्यवहारिक, अभिप्राय अौर इस तरह के अभिव्क्ति से परे समाज का चित्रण होना कर्तव्य हैं।
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धर्मों ,जातीय भेदभाव ,ऊंच नीच ,अमीरी गरीबी पहले ही लाजमी रहे हैं,अभी खानदानी,रुतबा,नवाबी ठाठ , परिवारिक अस्तर पर दिखावटीपन वगैरह का ढोल पीटते हैं, सब खोखलापन हैं।
बीती अाप पे भी हुई होगी एसे मानसिकता का वर्ताव , कही न कही होता रहना अाम बात है। भैया अाज कल पढी लिखी अाधुनिक दुनियादारी पर बाबाअो के भ्रमात्मक धार्मिक ढोंग का प्रचार प्रसार प्रगतिशील रहता है,दुसरी। तरफ अराजकता का चौड़ा सीना शहर मे नामी गिनामी कानुनी तौर पर पुलिसिया मेहमान , खौफ से या जुडकर खौफ पैदा करना इज्जत वाली बात हैं। विचार अौर चर्चाएं अापसी ताकत का समर्थन करती हैं। हमे मिलकर नियंत्रण का तहजीब सीखाती है।जिन बातों का अालोचना ,शिकायत दिनचर्या के घृणित दृश्य उदाहरण मात्र कपट भ्रस्ट नेतृत्वहीन, गुंडागर्दी ,बलात्कार, मतलबी अनअौचित्य ए मर्यादाअो का हनन  ,सामाजिक दुर्बलता असहनीय है।विभिन्न मुद्दाअो पर विकल्प सहित फिक्र रहनी चाहिए ।

  सही नैतिकता ,धर्म,कर्म हमारी संस्कृति जीवन यापन के परिभाषित अनुसरणिय निर्मित संसकारिक वेद ,उपनिषद ,बहुत से शास्त्र उल्लेखनिय है। जिनका अात्मकरण अाध्यात्मिक तरीके से खुद मे सन्निहित रखना चाहिए।
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हमारी प्रकृति,कायनात,निश्छल फितरत उपरवाले के खुबसूरत जहाँ मे कोइ भेद परम्परा रीवाज निर्धारित नहीं,उसके रचाए इस नजाकत को सम झे तो यही पते की बात होगी , निर्मल मन मौजी रहे, खुश रहे, दिल मे बेझिझक प्यार हो, पुन्य तन से हर किसी पे निसार रहे,खुद जिदंगी का लुप्त लिजिए अोरो को भी सहयोगी रहे ( जिए अौर जीने दे प्यार से )।


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